दोस्तों कल मैं मेरे एक करीबी मित्र जो एक अध्यापक है उनके साथ अध्यापक के विषय पर बात कर रहा था। तो आज मैं अध्यापक के बारे में मेरे विचार प्रकट करूँगा।
दोस्तों यह एक निर्विवाद सत्य है कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में अध्यापक का स्थान अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। राष्ट्र का सच्चा और वास्तविक निर्माता अध्यापक ही माना जाता है। जिस प्रकार पौधे को वृक्ष रुप में परिवर्तित करने के लिए अथक परिश्रम द्वारा उसकी देखभाल की जाती है, ठीक उसी प्रकार विद्यालय रुपी उपवन में विकसित होने वाले शिशु रुपी पौधों का सर्वांगीण विकास अध्यापक द्वारा किया जाता है। वह अपने विद्यार्थियों को शिक्षित और ज्ञानवान बनाकर ज्ञान की एक ऐसी अखंड ज्योति जला देता है जो देश और समाज के अंधकार को दूर कर सत्य और न्याय का प्रकाश फैलाती है।
दोस्तों विद्यार्थी राष्ट्र के भावी कर्णाधार हैं और इनका नैतिक, मानसिक तथा शारीरिक विकास अध्यापक के ऊपर ही निर्भर है। पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में योग्य, परिश्रमी तथा ईमानदार व्यक्ति की ही आवश्यकता होती है। ऐसे योग्य व्यक्ति को शिक्षित बनाने और पूर्णरुपेण तैयार करने का कार्य अध्यापक ही करता है।
दोस्तों प्राचीन काल में तो हमारे देश में अध्यापक का सम्मान बहुत ही अधिक होता था। नालंदा और तक्षशिला के विश्वविद्यालय अपने विद्वान आदर्श अध्यापकों के कारण ही लोक विख्यात थे। भारतीय समाज के व्यवस्थापकों की दृष्टि में अध्यापक का मूल्य कितना अधिक था। दोस्तों माता-पिता तो केवल शरीर सरंचना ही करते हैं परंतु आचार्य, ज्ञान और सदाचार की शिक्षा देकर मानव को जो दिव्य ज्योति देता है, वह सत्य अजर और अमर है।
लेकिन दोस्तों आज अत्यंत दुख के साथ यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि अध्यापकों को गौरवपूर्ण स्थान जो कभी था वह अब नहीं रहा। इसका मुख्य कारण हमारी दूषित शिक्षा प्रणाली है। फिर भी, कैसी भी विषम परिस्थितियां क्यों न हों राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में अध्यापक का महत्व और दायित्व तो बना ही रहेगा।
दोस्तों अपने देश भारत की वर्तमान व्यवस्था में यद्यपि अध्यापक को अपना उचित स्थान प्राप्त नहीं है लेकिन नागरिकों में अच्छे संस्कार डालने के लिए विषम परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए राष्ट्र निर्माण में लगा रहना पड़ेगा।
दोस्तों यही नहीं न जाने कितने उदगार इस समय मेरे मानसपटल पर उभर रहे हैं पर कहने का तात्पर्य मेरा इतना ही है कि एक आदर्श अध्यापक अपने छात्र के जीवन को बनाता ही नहीं बल्कि उसे बहुत ऊंचा उठाता है। ऐसे अध्यापक को समाज और राष्ट्र में उचित स्थान न मिलना अध्यापक का ही नहीं देश का अपमान है। क्योंकि बिना अध्यापक की प्रेरणा और मार्ग दर्शन के कोई भी देश प्रगति के पथ पर कैसे अग्रसर हो सकेगा।
अंत में दोस्तों मैं तो यही कहूंगा कि राष्ट्र निर्माण और विकास के लिए अध्यापक को समाज में उचित और सम्मानीय स्थान मिलना ही चाहिए।
सुप्रभात
जय अंबे
श्री राम
जय महादेव
दोस्तों यह एक निर्विवाद सत्य है कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में अध्यापक का स्थान अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। राष्ट्र का सच्चा और वास्तविक निर्माता अध्यापक ही माना जाता है। जिस प्रकार पौधे को वृक्ष रुप में परिवर्तित करने के लिए अथक परिश्रम द्वारा उसकी देखभाल की जाती है, ठीक उसी प्रकार विद्यालय रुपी उपवन में विकसित होने वाले शिशु रुपी पौधों का सर्वांगीण विकास अध्यापक द्वारा किया जाता है। वह अपने विद्यार्थियों को शिक्षित और ज्ञानवान बनाकर ज्ञान की एक ऐसी अखंड ज्योति जला देता है जो देश और समाज के अंधकार को दूर कर सत्य और न्याय का प्रकाश फैलाती है।
दोस्तों विद्यार्थी राष्ट्र के भावी कर्णाधार हैं और इनका नैतिक, मानसिक तथा शारीरिक विकास अध्यापक के ऊपर ही निर्भर है। पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में योग्य, परिश्रमी तथा ईमानदार व्यक्ति की ही आवश्यकता होती है। ऐसे योग्य व्यक्ति को शिक्षित बनाने और पूर्णरुपेण तैयार करने का कार्य अध्यापक ही करता है।
दोस्तों प्राचीन काल में तो हमारे देश में अध्यापक का सम्मान बहुत ही अधिक होता था। नालंदा और तक्षशिला के विश्वविद्यालय अपने विद्वान आदर्श अध्यापकों के कारण ही लोक विख्यात थे। भारतीय समाज के व्यवस्थापकों की दृष्टि में अध्यापक का मूल्य कितना अधिक था। दोस्तों माता-पिता तो केवल शरीर सरंचना ही करते हैं परंतु आचार्य, ज्ञान और सदाचार की शिक्षा देकर मानव को जो दिव्य ज्योति देता है, वह सत्य अजर और अमर है।
लेकिन दोस्तों आज अत्यंत दुख के साथ यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि अध्यापकों को गौरवपूर्ण स्थान जो कभी था वह अब नहीं रहा। इसका मुख्य कारण हमारी दूषित शिक्षा प्रणाली है। फिर भी, कैसी भी विषम परिस्थितियां क्यों न हों राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में अध्यापक का महत्व और दायित्व तो बना ही रहेगा।
दोस्तों अपने देश भारत की वर्तमान व्यवस्था में यद्यपि अध्यापक को अपना उचित स्थान प्राप्त नहीं है लेकिन नागरिकों में अच्छे संस्कार डालने के लिए विषम परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए राष्ट्र निर्माण में लगा रहना पड़ेगा।
दोस्तों यही नहीं न जाने कितने उदगार इस समय मेरे मानसपटल पर उभर रहे हैं पर कहने का तात्पर्य मेरा इतना ही है कि एक आदर्श अध्यापक अपने छात्र के जीवन को बनाता ही नहीं बल्कि उसे बहुत ऊंचा उठाता है। ऐसे अध्यापक को समाज और राष्ट्र में उचित स्थान न मिलना अध्यापक का ही नहीं देश का अपमान है। क्योंकि बिना अध्यापक की प्रेरणा और मार्ग दर्शन के कोई भी देश प्रगति के पथ पर कैसे अग्रसर हो सकेगा।
अंत में दोस्तों मैं तो यही कहूंगा कि राष्ट्र निर्माण और विकास के लिए अध्यापक को समाज में उचित और सम्मानीय स्थान मिलना ही चाहिए।
सुप्रभात
जय अंबे
श्री राम
जय महादेव